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देवी भागवत महापुराण ( देवी भागवत)

Devi Bhagwat Purana (Devi Bhagwat Katha)

स्कन्ध 9, अध्याय 9 - Skand 9, Adhyay 9

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पृथ्वीकी उत्पत्तिका प्रसंग, ध्यान और पूजनका प्रकार तथा उनकी स्तुति

नारदजी बोले - [हे भगवन्!] आपने बतलाया कि देवीके निमेषमात्र व्यतीत होनेपर ब्रह्माका अन्त हो जाता है और उनका यह विनाश ही प्राकृतिक प्रलय कहा गया है उस प्राकृत प्रलयके होनेपर पृथ्वी अदृश्य हो जाती है-ऐसा कहा गया है, साथ ही सभी लोक जलमें डूब जाते हैं और समस्त प्राणी परमात्मामें विलीन हो जाते हैं। [हे प्रभो!] उस समय अदृश्य हुई वह पृथ्वी कहाँ स्थित रहती है और सृष्टि होनेके समय वह पुन: कैसे प्रकट हो जाती है ? वह पृथ्वी फिरसे धन्य, मान्य, सबको आश्रय प्रदान करनेवाली तथा विजयशालिनी कैसे हो जाती है ? अब आप उस पृथ्वीके उद्भवकी मंगलकारी कथा कहिये ll 1-4 ॥

श्रीनारायण बोले- [ हे नारद!] सम्पूर्ण सृष्टियोंके आरम्भ में भगवतीसे ही अखिल जगत्की उत्पत्ति होती है। इस प्रकार सबका उन्हींसे आविर्भाव होता है और सभी प्रलयोंके समय प्राणियोंका उन्होंमें विलय हो जाता है-ऐसा श्रुति कहती है ॥ 5 ॥

अब आप पृथ्वीके जन्मका वृत्तान्त सुनिये; जो सभी प्रकारका मंगल करनेवाला, विघ्नोंका नाश करनेवाला, पापोंका उच्छेद करनेवाला तथा पुण्यकी वृद्धि करनेवाला है ॥ 6 ॥

कुछ लोग कहते हैं कि मधु-कैटभ नामक दैत्योंके मेदसे यह धन्य पृथ्वी उत्पन्न हुई, किंतु इससे जो भिन्न मत है, उसे सुनो। उन दोनों दैत्योंने प्राचीनकालमें भगवान् विष्णु के साथ युद्धमें उनके तेजसे प्रसन्न होकर उनसे कहा कि हमदोनोंका वध वर्हीींपर हो, जहाँ पृथ्वी जलमग्न न हो। उनके जीवनकाल पृथ्वी जलके भीतर स्थित रहनेके कारण स्पष्ट रूपसे दिखायी नहीं पड़ती थी यह बात उन्हें जा भी थी। इसीलिये उन्होंने वह वर माँगा था। उन दोनोंके वधके उपरान्त उनका मेद प्रभूत मात्रामें फैल गया। इस कारण पृथ्वी मेदिनी नामसे प्रसिद्ध हुई। इसका स्पष्टीकरण सुनो जलसे बाहर निकलनेके अनन्तर ही पृथ्वी मेदसे परिपुष्ट हुई। | इसीलिये उसका नाम मेदिनी पड़ा। मैं अब पृथ्वीके जन्मकी मंगलकारिणी तथा श्रुतिप्रतिपादित सार्थक कथा कहता हूँ, जिसे मैंने पहले धर्मराजके मुखसे पुष्करक्षेत्रमें सुना था ॥ 7-11 ॥

महाविराट् पुरुष अनन्त कालसे जलमें स्थित रहते हैं, यह स्पष्ट है। समयानुसार उनके भीतर सर्वांगव्यापी शाश्वत मन प्रकट हुआ। तत्पश्चात् वह मन उस महाविराट् पुरुषके सभी रोमकूपोंमें प्रविष्ट हो गया। हे मुने। बहुत समयके पश्चात् उन्हीं रोमकूपोंसे पृथ्वी प्रकट हुई ॥ 12-13 ॥

उस महाविराट्के जितने रोमकूप हैं, उन सबमें सर्वदा स्थित रहनेवाली यह पृथ्वी एक एक करके जलसहित बार-बार प्रकट होती और छिपती रहती है ।॥ 14 ॥

यह पृथ्वी सृष्टिके समय प्रकट होकर जलके ऊपर स्थित हो जाती है और प्रलयके समय यह अदृश्य होकर जलके भीतर स्थित रहती है ॥ 15 ॥

प्रत्येक ब्रह्माण्डमें यह पृथ्वी पर्वतों तथा वनोंसे सम्पन्न रहती है, सात समुद्रोंसे घिरी रहती है और सात द्वीपोंसे युक्त रहती है ॥ 16 ॥

यह वसुधा हिमालय तथा मेरु आदि पर्वतों, सूर्य तथा चन्द्र आदि ग्रहोंसे संयुक्त रहती है। महाविराकी आज्ञाके अनुसार ब्रह्मा, विष्णु, शिव आदि देवता इसपर प्रकट होते हैं तथा समस्त प्राणी इसपर निवास करते हैं ।। 17 ।।यह पृथ्वी पुण्यतीर्थों तथा पवित्र भारतदेशसे सम्पन्न है। यह स्वर्णमयी भूमिसे सुशोभित है तथा सात स्वर्गोंसे समन्वित है। इस पृथ्वीके नीचे सात पाताल हैं, ऊपर ब्रह्मलोक है तथा ब्रह्मलोकसे भी ऊपर ध्रुवलोक है और उसमें समस्त विश्व स्थित है। इस प्रकार सम्पूर्ण लोक पृथ्वीपर ही निर्मित हैं। ये सभी विश्व विनाशशील तथा कृत्रिम हैं ।॥ 18-20 ॥ प्राकृत प्रलयके अवसरपर ब्रह्माका भी निपात हो जाता है। उस समय केवल महाविराट् पुरुष विद्यमान रहते हैं; क्योंकि सृष्टिके आरम्भमें ही परब्रह्म श्रीकृष्णने इनका सृजन किया था ॥ 21 ॥

ये सृष्टि तथा प्रलय नित्य हैं और काष्ठा आदि अवयवोंवाले कालके स्वामीके अधीन होकर रहते हैं। सभीकी अधिष्ठातृदेवी पृथ्वी भी नित्य हैं। वाराहकल्पमें सभी देवता, मुनि, मनु, विप्र, गन्धर्व आदिने उन पृथ्वीका पूजन किया था। वेदसम्मत वे पृथ्वी वराहरूपधारी भगवान् विष्णुकी पत्नीके रूपमें विराजमान हुईं; उनके पुत्ररूपमें मंगलको तथा मंगलके पुत्ररूपमें घटेशको जानना चाहिये ॥ 22-233 ॥

नारदजी बोले – देवताओंने वाराहकल्पमें किस रूपमें पृथ्वीका पूजन किया था ? सभी लोग उस वाराहकल्पमें सबको आश्रय प्रदान करनेवाली इस वाराही साध्वी पृथ्वीकी पूजा करते थे। यह पृथ्वी पंचीकरण-मार्गसे मूलप्रकृतिसे उत्पन्न हुई है। हे प्रभो! नीचे तथा ऊपरके लोकोंमें उस पृथ्वीके पूजनके विविध प्रकार और (पृथ्वीपुत्र) मंगलके कल्याणमय जन्म तथा निवास स्थानके विषयमें भी बताइये ll 24-26 ll

श्रीनारायण बोले- [हे नारद!] प्राचीन कालमें वाराहकल्पमें ब्रह्माजीके द्वारा स्तुति करनेपर भगवान् श्रीहरि वराहरूप धारण करके हिरण्याक्षको मारकर रसातलसे पृथ्वीको निकाल ले आये ॥ 27 ॥

उन्होंने पृथ्वीको जलमें इस प्रकार रख दिया, मानो सरोवरमें कमलपत्र स्थित हो। वहींपर रहकर ब्रह्माजीने सम्पूर्ण मनोहर विश्वकी रचना की ॥ 28 ॥ पृथ्वीकी अधिष्ठात्री देवीको कामभावसे युक्त देखकर करोड़ों सूर्यके समान प्रभावाले वाराहरूपधारी | सकाम भगवान् श्रीहरिने अपना अत्यन्त मनोहर तथा रतिकलायोग्य समग्र रूप बना करके उसके साथ एकान्तमें दिव्य एक वर्षतक निरन्तर विहार किया। आनन्दकी अनुभूतिसे वह सुन्दरी मूर्च्छित हो गयी। विदग्ध पुरुषके साथ विदग्ध स्त्रीका संगम अत्यन्त सुखदायक होता है। उस सुन्दरीके अंग-संश्लेषके कारण विष्णुको दिन-रातका ज्ञान भी नहीं रहा। एक वर्षके पश्चात् चेतना आनेपर भगवान् श्रीहरि उससे विलग हो गये । ll 29-32 ॥

तदनन्तर उन्होंने लीलापूर्वक अपना पूर्वका वराह रूप धारण कर लिया। इसके बाद साध्वी भगवती पृथ्वीका ध्यान करके धूप, दीप, नैवेद्य, सिन्दूर, चन्दन, वस्त्र, पुष्प और बलि आदिसे उनकी पूजा करके श्रीहरि उनसे कहने लगे ॥33-34॥

श्रीभगवान् बोले- हे शुभे ! तुम सबको आश्रय देनेवाली बनो। तुम मुनि, मनु, देवता, सिद्ध और दानव आदि-सभीके द्वारा भलीभाँति पूजित होकर सुख प्राप्त करोगी 35 ॥

अम्बुवाचीयोगको छोड़कर अन्य दिनोंमें, गृहारम्भ, गृहप्रवेश, बावली तथा सरोवरके निर्माणके समयपर, गृह तथा कृषिकार्यके अवसरपर देवता आदि सभी लोग मेरे वरके प्रभावसे तुम्हारी पूजा करेंगे और जो मूर्ख प्राणी तुम्हारी पूजा नहीं करेंगे, वे नरकमें जायँगे ।। 36-37 ॥

वसुधा बोली- हे भगवन्! आपकी आज्ञाके अनुसार मैं वाराहीरूपसे समस्त स्थावर-जंगममय विश्वका लीलापूर्वक वहन करती हूँ। किंतु हे भगवन्! आप यह सुन लीजिये कि मैं मोती, सीप, शालग्रामशिला, शिवलिंग, पार्वतीविग्रह, शंख, दीप, यन्त्र, माणिक्य, हीरा, यज्ञोपवीत, पुष्प, पुस्तक, तुलसीदल, जपमाला, पुष्पमाला, कपूर, सुवर्ण, गोरोचन, चन्दन और शालग्रामका जल-इन वस्तुओंका वहन करनेमें सर्वथा असमर्थ हूँ, इससे मुझे क्लेश होता है ।। 38 - 41 ॥श्रीभगवान् बोले- हे सुन्दरि ! जो मूर्ख तुम्हारे ऊपर (अर्थात् आसनविहीन भूमिपर) ये वस्तुएँ रखेंगे, वे कालसूत्र नामक नरकमें दिव्य सौ वर्षोंतक निवास करेंगे ॥ 42 ॥

हे नारद ! यह कहकर भगवान् चुप हो गये। उस समय पृथ्वी गर्भवती हो चुकी थीं। उसी गर्भसे तेजस्वी मंगलग्रह उत्पन्न हुए ॥ 43 ॥ भगवान्‌की आज्ञाके अनुसार वहाँ उपस्थित सभी लोगोंने पृथ्वीकी पूजा की और कण्वशाखामें कहे गये ध्यान तथा स्तोत्रपाठसे उनकी स्तुति की और मूलमन्त्रसे नैवेद्य आदि अर्पण किया। इस प्रकार तीनों लोकोंमें उन पृथ्वीकी पूजा तथा स्तुति होने लगी । 44-45 ॥ नारदजी बोले - पृथ्वीका ध्यान क्या है, उनका स्तवन क्या है और उनका मूलमन्त्र क्या है, यह सब मुझे बतलाइये समस्त पुराणोंमें निगूढ़ इस प्रसंगको सुननेके लिये मुझे बहुत कौतूहल हो रहा है ॥ 46 ॥

श्रीनारायण बोले- सर्वप्रथम भगवान् वराहने भगवती पृथ्वीकी पूजा की, तत्पश्चात् ब्रह्माजीद्वारा इन पृथ्वीकी पूजा की गयी। इसके बाद सभी मुनीश्वरों, मनुओं और मनुष्यों आदिने पृथ्वीकी पूजा की ॥ 473 ॥

हे नारद! सुनिये; अब मैं पृथ्वीके ध्यान, स्तवन तथा मन्त्रके विषयमें बता रहा हूँ। 'ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं वसुधायै स्वाहा' – इस मन्त्रसे भगवान् विष्णुने प्राचीनकालमें इनका पूजन किया था। उनके ध्यानका स्वरूप यह है- 'पृथ्वीदेवी श्वेतकमलके वर्णके समान आभासे युक्त हैं, उनका मुखमण्डल शरत्पूर्णिमाके चन्द्रमाके समान है, उनके सम्पूर्ण अंग चन्दनसे अनुलिप्त हैं, वे रत्नमय अलंकारोंसे सुशोभित हैं, वे रत्नोंकी आधारस्वरूपा हैं, वे रत्नगर्भा हैं, वे रत्नोंके आकर (खान) से समन्वित हैं, उन्होंने अग्निके समान विशुद्ध वस्त्र धारण कर रखे हैं, उनका मुखमण्डल मुसकानसे युक्त है तथा वे सभी लोगोंके द्वारा वन्दित हैं- मैं ऐसी पृथ्वीदेवीकी आराधना करता हूँ।' इस प्रकारके ध्यानसे सभी लोगोंके द्वारा पृथ्वी पूजित हुईं। हे विप्रवर! अब कण्वशाखामें प्रतिपादित इनकी स्तुति सुनिये ॥ 48 – 513 ॥श्रीनारायण बोले- जलकी आधारस्वरूपिणी, जलमयी तथा सबको जल प्रदान करनेवाली, यज्ञवराह की भार्या तथा विजयकी प्राप्ति करानेवाली हे भगवति जये! आप मुझे विजय प्रदान कीजिये। मंगल करनेवाली, मंगलकी आश्रयस्वरूपिणी, मंगलमयी तथा मंगल प्रदान करनेवाली हे मंगलेश्वरि! हे भवे! | मेरे मंगलके लिये आप मुझे मंगल प्रदान कीजिये। सबको आश्रय देनेवाली, सब कुछ जाननेवाली, सर्वशक्तिमयी तथा सभी लोगोंके मनोरथ पूर्ण करनेवाली हे देवि! हे भवे! मेरा सम्पूर्ण अभिलषित मुझे प्रदान कीजिये। पुण्यमय विग्रहवाली, पुण्योंकी बीजस्वरूपा, सनातनी, पुण्यको आश्रय देनेवाली, पुण्यवानोंकी शरणस्थली तथा पुण्य प्रदान करनेवाली हे भवे! मुझे पुण्य प्रदान कीजिये। सभी फसलोंकी आलयस्वरूपिणी, सभी प्रकारकी फसलोंसे सम्पन्न, सभी फसलें प्रदान करनेवाली, (समयपर) सभी फसलोंको अपनेमें विलीन कर लेनेवाली तथा सभी फसलोंकी आत्मस्वरूपा है। भवे! मुझे फसलें प्रदान कीजिये। राजाओंकी सर्वस्व, राजाओंसे सम्मान पानेवाली, राजाओंको सुखी करनेवाली तथा भूमि प्रदान करनेवाली हे भूमे ! मुझे भूमि प्रदान कीजिये ।। 52-573 ॥

जो मनुष्य प्रातः काल उठकर इस महान् पुण्यप्रद स्तोत्रका पाठ करता है, वह करोड़ों जन्मोंतक बलवान् तथा राजाओंका अधीश्वर होता है। इसके पढ़नेसे मनुष्य भूमिदान करनेसे होनेवाला पुण्य प्राप्त कर लेते हैं। हे मुने! इस स्तोत्रका पाठ करनेसे मनुष्य दानमें दी गयी भूमिका हरण करने, अम्बुवाची दिनोंमें भूमि सम्बन्धी कार्य करने, बिना आज्ञाके दूसरेके कुएँगे कूप खनन करने, दूसरेकी भूमिका हरण करने, | पृथ्वीपर वीर्यत्याग करने तथा भूमिपर दीपक आदि रखने से होनेवाले पापसे निश्चितरूपसे मुक्त हो जाता है और साथ ही वह एक सौ अश्वमेधयज्ञ करनेसे होनेवाला पुण्य भी प्राप्त कर लेता है; इसमें कोई सन्देह नहीं है। भूमिदेवीका यह महान् स्तोत्र सभी | प्रकारका कल्याण करनेवाला है ॥ 58-63 ॥

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देवी भागवत महापुराण
Index


  1. [अध्याय 1] प्रकृतितत्त्वविमर्श प्रकृतिके अंश, कला एवं कलांशसे उत्पन्न देवियोंका वर्णन
  2. [अध्याय 2] परब्रह्म श्रीकृष्ण और श्रीराधासे प्रकट चिन्मय देवताओं एवं देवियोंका वर्णन
  3. [अध्याय 3] परिपूर्णतम श्रीकृष्ण और चिन्मयी राधासे प्रकट विराट्रूप बालकका वर्णन
  4. [अध्याय 4] सरस्वतीकी पूजाका विधान तथा कवच
  5. [अध्याय 5] याज्ञवल्क्यद्वारा भगवती सरस्वतीकी स्तुति
  6. [अध्याय 6] लक्ष्मी, सरस्वती तथा गंगाका परस्पर शापवश भारतवर्षमें पधारना
  7. [अध्याय 7] भगवान् नारायणका गंगा, लक्ष्मी और सरस्वतीसे उनके शापकी अवधि बताना तथा अपने भक्तोंके महत्त्वका वर्णन करना
  8. [अध्याय 8] कलियुगका वर्णन, परब्रह्म परमात्मा एवं शक्तिस्वरूपा मूलप्रकृतिकी कृपासे त्रिदेवों तथा देवियोंके प्रभावका वर्णन और गोलोकमें राधा-कृष्णका दर्शन
  9. [अध्याय 9] पृथ्वीकी उत्पत्तिका प्रसंग, ध्यान और पूजनका प्रकार तथा उनकी स्तुति
  10. [अध्याय 10] पृथ्वीके प्रति शास्त्र - विपरीत व्यवहार करनेपर नरकोंकी प्राप्तिका वर्णन
  11. [अध्याय 11] गंगाकी उत्पत्ति एवं उनका माहात्म्य
  12. [अध्याय 12] गंगाके ध्यान एवं स्तवनका वर्णन, गोलोकमें श्रीराधा-कृष्णके अंशसे गंगाके प्रादुर्भावकी कथा
  13. [अध्याय 13] श्रीराधाजीके रोषसे भयभीत गंगाका श्रीकृष्णके चरणकमलोंकी शरण लेना, श्रीकृष्णके प्रति राधाका उपालम्भ, ब्रह्माजीकी स्तुतिसे राधाका प्रसन्न होना तथा गंगाका प्रकट होना
  14. [अध्याय 14] गंगाके विष्णुपत्नी होनेका प्रसंग
  15. [अध्याय 15] तुलसीके कथा-प्रसंगमें राजा वृषध्वजका चरित्र- वर्णन
  16. [अध्याय 16] वेदवतीकी कथा, इसी प्रसंगमें भगवान् श्रीरामके चरित्रके एक अंशका कथन, भगवती सीता तथा द्रौपदी के पूर्वजन्मका वृत्तान्त
  17. [अध्याय 17] भगवती तुलसीके प्रादुर्भावका प्रसंग
  18. [अध्याय 18] तुलसीको स्वप्न में शंखचूड़का दर्शन, ब्रह्माजीका शंखचूड़ तथा तुलसीको विवाहके लिये आदेश देना
  19. [अध्याय 19] तुलसीके साथ शंखचूड़का गान्धर्वविवाह, शंखचूड़से पराजित और निर्वासित देवताओंका ब्रह्मा तथा शंकरजीके साथ वैकुण्ठधाम जाना, श्रीहरिका शंखचूड़के पूर्वजन्मका वृत्तान्त बताना
  20. [अध्याय 20] पुष्पदन्तका शंखचूड़के पास जाकर भगवान् शंकरका सन्देश सुनाना, युद्धकी बात सुनकर तुलसीका सन्तप्त होना और शंखचूड़का उसे ज्ञानोपदेश देना
  21. [अध्याय 21] शंखचूड़ और भगवान् शंकरका विशद वार्तालाप
  22. [अध्याय 22] कुमार कार्तिकेय और भगवती भद्रकालीसे शंखचूड़का भयंकर बुद्ध और आकाशवाणीका पाशुपतास्त्रसे शंखचूड़की अवध्यताका कारण बताना
  23. [अध्याय 23] भगवान् शंकर और शंखचूड़का युद्ध, भगवान् श्रीहरिका वृद्ध ब्राह्मणके वेशमें शंखचूड़से कवच माँग लेना तथा शंखचूड़का रूप धारणकर तुलसीसे हास-विलास करना, शंखचूड़का भस्म होना और सुदामागोपके रूपमें गोलोक पहुँचना
  24. [अध्याय 24] शंखचूड़रूपधारी श्रीहरिका तुलसीके भवनमें जाना, तुलसीका श्रीहरिको पाषाण होनेका शाप देना, तुलसी-महिमा, शालग्रामके विभिन्न लक्षण एवं माहात्म्यका वर्णन
  25. [अध्याय 25] तुलसी पूजन, ध्यान, नामाष्टक तथा तुलसीस्तवनका वर्णन
  26. [अध्याय 26] सावित्रीदेवीकी पूजा-स्तुतिका विधान
  27. [अध्याय 27] भगवती सावित्रीकी उपासनासे राजा अश्वपतिको सावित्री नामक कन्याकी प्राप्ति, सत्यवान् के साथ सावित्रीका विवाह, सत्यवान्की मृत्यु, सावित्री और यमराजका संवाद
  28. [अध्याय 28] सावित्री यमराज-संवाद
  29. [अध्याय 29] सावित्री धर्मराजके प्रश्नोत्तर और धर्मराजद्वारा सावित्रीको वरदान
  30. [अध्याय 30] दिव्य लोकोंकी प्राप्ति करानेवाले पुण्यकर्मोंका वर्णन
  31. [अध्याय 31] सावित्रीका यमाष्टकद्वारा धर्मराजका स्तवन
  32. [अध्याय 32] धर्मराजका सावित्रीको अशुभ कर्मोंके फल बताना
  33. [अध्याय 33] विभिन्न नरककुण्डों में जानेवाले पापियों तथा उनके पापोंका वर्णन
  34. [अध्याय 34] विभिन्न पापकर्म तथा उनके कारण प्राप्त होनेवाले नरकका वर्णन
  35. [अध्याय 35] विभिन्न पापकर्मोंसे प्राप्त होनेवाली विभिन्न योनियोंका वर्णन
  36. [अध्याय 36] धर्मराजद्वारा सावित्रीसे देवोपासनासे प्राप्त होनेवाले पुण्यफलोंको कहना
  37. [अध्याय 37] विभिन्न नरककुण्ड तथा वहाँ दी जानेवाली यातनाका वर्णन
  38. [अध्याय 38] धर्मराजका सावित्री से भगवतीकी महिमाका वर्णन करना और उसके पतिको जीवनदान देना
  39. [अध्याय 39] भगवती लक्ष्मीका प्राकट्य, समस्त देवताओंद्वारा उनका पूजन
  40. [अध्याय 40] दुर्वासाके शापसे इन्द्रका श्रीहीन हो जाना
  41. [अध्याय 41] ब्रह्माजीका इन्द्र तथा देवताओंको साथ लेकर श्रीहरिके पास जाना, श्रीहरिका उनसे लक्ष्मीके रुष्ट होनेके कारणोंको बताना, समुद्रमन्थन तथा उससे लक्ष्मीजीका प्रादुर्भाव
  42. [अध्याय 42] इन्द्रद्वारा भगवती लक्ष्मीका षोडशोपचार पूजन एवं स्तवन
  43. [अध्याय 43] भगवती स्वाहाका उपाख्यान
  44. [अध्याय 44] भगवती स्वधाका उपाख्यान
  45. [अध्याय 45] भगवती दक्षिणाका उपाख्यान
  46. [अध्याय 46] भगवती षष्ठीकी महिमाके प्रसंगमें राजा प्रियव्रतकी कथा
  47. [अध्याय 47] भगवती मंगलचण्डी तथा भगवती मनसाका आख्यान
  48. [अध्याय 48] भगवती मनसाका पूजन- विधान, मनसा-पुत्र आस्तीकका जनमेजयके सर्पसत्रमें नागोंकी रक्षा करना, इन्द्रद्वारा मनसादेवीका स्तवन करना
  49. [अध्याय 49] आदि गौ सुरभिदेवीका आख्यान
  50. [अध्याय 50] भगवती श्रीराधा तथा श्रीदुर्गाके मन्त्र, ध्यान, पूजा-विधान तथा स्तवनका वर्णन