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देवी भागवत महापुराण ( देवी भागवत)

Devi Bhagwat Purana (Devi Bhagwat Katha)

स्कन्ध 9, अध्याय 4 - Skand 9, Adhyay 4

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सरस्वतीकी पूजाका विधान तथा कवच

नारदजी बोले – हे भगवन्! मैंने आपकी कृपासे यह अमृततुल्य सारी कथा तो सुन ली, अब आप प्रकृतिदेवियोंके पूजनका विस्तृत वर्णन कीजिये ॥ 1 ॥

किसने किस देवीकी पूजा की और उसने मृत्युलोकमें किस प्रकार पूजाका विस्तार किया ? हे प्रभो! किस मन्त्रसे किस देवीकी पूजा तथा किस स्तोत्रसे किस देवीको स्तुति की गयी ? उन देवियोंके स्तोत्र, ध्यान, प्रभाव तथा पवित्र चरित्रके विषयमें मुझे बताइये। साथ ही किन-किन देवियोंने किन-किन भक्तोंको वर प्रदान किये, कृपा करके मुझे वह भी बताइये ॥ 2-3 ॥

श्रीनारायण बोले- हे नारद! मूलप्रकृति सृष्टिकार्यके प्रयोजनार्थ गणेशजननी दुर्गा, राधा, लक्ष्मी, सरस्वती तथा सावित्री - इन पाँच रूपोंवाली कही गयी हैं ॥ 4 ॥

इन देवियोंकी पूजा अत्यन्त प्रसिद्ध है, इनका प्रभाव परम अद्भुत है और इनका चरित्र अमृततुल्य तथा सभी मंगलोंका कारण है ॥ 5 ॥

हे ब्रह्मन् ! प्रकृतिकी अंशसंज्ञक तथा कलासंज्ञक जो देवियाँ हैं, उनका सम्पूर्ण पवित्र चरित्र मैं आपको बता रहा हूँ, सावधान होकर सुनिये ॥ 6 ॥

काली, वसुन्धरा, गंगा, षष्ठी, मंगलचण्डिका, तुलसी, मनसा, निद्रा, स्वधा, स्वाहा तथा दक्षिणा इन देवियोंके महान् पुण्यदायक तथा सुननेमें प्रिय चरित्रका एवं प्राणियोंके कर्मविपाकका मैं संक्षिप्त तथा सुन्दर वर्णन करूँगा ॥ 7-8 ॥

दुर्गा और राधाका चरित्र बहुत विस्तृत है, उसीका विस्तार बादमें कहूँगा। पहले संक्षेपके क्रमसे सुन लीजिये ॥ 9 ॥हे मुनिश्रेष्ठ ! सर्वप्रथम श्रीकृष्णने सरस्वतीकी पूजा प्रारम्भ की, जिनकी कृपासे मूर्ख भी विद्वान् हो जाता है ॥ 10 ॥

जब देवी सरस्वती कृष्णवल्लभा राधाके मुखसे प्रकट हुई, तब उन कामरूपा कामिनीने श्रीकृष्णको कामभावसे प्राप्त करनेकी लालसा की ॥ 11 ॥

उनका अभिप्राय समझकर सर्वज्ञ भगवान् श्रीकृष्ण सबकी माता उन सरस्वतीसे सत्य, हितकर तथा परिणाममें सुखकर बात कही ॥ 12 ॥

श्रीकृष्ण बोले- हे साध्वि! तुम मेरे ही अंशस्वरूप चतुर्भुज नारायणका सेवन करो। वे सदा तरुणावस्था में विराजमान, सुन्दर रूपवाले, सभी गुणोंसे सम्पन्न तथा मेरे ही समान हैं। वे कामिनियोंकी कामनाओंको जाननेवाले तथा उनकी कामनाओंको पूर्ण करनेवाले हैं, करोड़ों कामदेवोंके समान सुन्दर हैं और लीलामय अलंकारोंसे अलंकृत हैं तथा ऐश्वर्यसे सम्पन्न हैं । 13-14 ॥

हे कान्ते! मुझे पति बनाकर यदि तुम यहाँ रहना चाहती हो, तो तुमसे भी अधिक बलवती राधा यहाँ हैं, अतः तुम्हारा कल्याण नहीं होगा ।। 15 ।

जो मनुष्य जिससे बलवान् होता है, वह उससे तो दूसरे प्राणीकी रक्षा करनेमें समर्थ है; किंतु यदि स्वयं सामर्थ्यरहित है तो दूसरोंकी रक्षा कैसे कर सकता है ? ॥ 16

सबका ईश्वर तथा सबपर शासन करनेवाला मैं राधाको रोक पाने में असमर्थ हैं; क्योंकि वे भी तेज, रूप तथा गुणमें मेरे ही समान हैं। किन्हीं भी पुरुषोंके लिये कोई पुत्र क्या प्राणसे अधिक प्रिय हो सकता है अर्थात् नहीं। वे राधा तो मेरे प्राणोंकी अधिष्ठात्री देवी हैं तो फिर उन प्राणरूपा राधाको छोड़ने में मैं कैसे समर्थ हो सकता हूँ। हे भद्रे! तुम वैकुण्ठलोक जाओ; तुम्हारा कल्याण होगा। उन्हों ऐश्वर्यसम्पन्न विष्णुको पति बनाकर दीर्घ | कालतक सुखपूर्वक आनन्द प्राप्त करो ।। 17-19 ॥

लोभ, मोह, काम, क्रोध, मान और हिंसासे रहित एवं तेज, रूप और गुणमें तुम्हारे ही समान [उनकी पत्नी] लक्ष्मी भी वहाँ हैं। उनके साथ तुम्हारा समय सदा प्रेमपूर्वक व्यतीत होगा और विष्णु भी तुम दोनोंका समान रूपसे सम्मान करेंगे ॥ 20-21 ॥हे सुन्दरि ! प्रत्येक ब्रह्माण्डमें माघ शुक्ल पंचमी तिथिको विद्यारम्भके अवसरपर मनुष्य, मनुगण, देवता, मुनीन्द्र, मुमुक्षुजन, वसु, योगी, सिद्ध, नाग, गन्धर्व और राक्षस मेरे वरके प्रभावसे आजसे लेकर प्रलयपर्यन्त प्रत्येक कल्पमें भक्तिपूर्वक षोडशोपचार पूजा अर्पण करके बड़े गौरवके साथ तुम्हारी उत्कृष्ट पूजा सम्पन्न करेंगे ll 22 - 24 ॥

जितेन्द्रिय तथा संयमशील व्यक्ति कण्वशाखामें कही गयी विधिके अनुसार ध्यान तथा स्तुतिपूर्वक घट अथवा पुस्तकमें आवाहित करके तुम्हारा पूजन करेंगे। तुम्हारे कवचको लिखकर उसे सोनेकी गुटिका (डिब्बी) में रखकर पुनः उसे गन्ध-चन्दन आदिसे | सुपूजित करके लोग अपने गले अथवा दाहिनी भुजामें धारण करेंगे। पूजाके पावन अवसरपर विद्वज्जन तुम्हारे इस कवचका पाठ करेंगे ॥ 25-263 ॥

ऐसा कहकर भगवान् श्रीकृष्णने सभी लोगोंके द्वारा पूजित उन भगवती सरस्वतीका पूजन किया। तत्पश्चात् ब्रह्मा, विष्णु, शिव, अनन्त, धर्म, सनकादि मुनीश्वर, देवता, मुनिगण, राजा और मनुष्य आदि ये सब भी सरस्वतीकी उपासना करने लगे। तभीसे ये सरस्वती सम्पूर्ण प्राणियोंके द्वारा सदा पूजित होने लगीं ॥। 27-29 ।।

नारदजी बोले हे वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ आप उन भगवतीके पूजाविधान, कवच, ध्यान, पूजाके उपयुक्त नैवेद्य, पुष्प, चन्दन आदिके विषयमें मुझे बतायें। यह सब सुननेकी लालसा मेरे हृदयमें निरन्तर बनी रहती है। सुननेमें इससे अधिक सुन्दर ( प्रिय) क्या हो सकता है ? ॥ 30-31 ॥

श्रीनारायण बोले- हे नारद! सुनिये, जगज्जननी सरस्वतीकी पूजाविधिसे संयुक्त कण्वशाखोक्त पद्धतिका वर्णन कर रहा हूँ ॥ 32 ॥

माघ शुक्ल पंचमी तथा विद्यारम्भके दिन भी पूर्वाह्नकालमें प्रतिज्ञा करके आराधक उस दिन संयम तथा पवित्रतासे युक्त रहे स्नान और नित्यक्रिया करके भक्तिपूर्वक कलश स्थापन करनेके बाद अपनी शाखामें कही गयी विधिसे अथवा तान्त्रिक विधिसे पहले गणेशजीका पूजन करके अभीष्ट देवी सरस्वतीकी विधिपूर्वक पूजा करनी चाहिये ।। 33-343 ll बताये गये ध्यानके द्वारा बाह्य घटमें देवीका ध्यान करके तत्पश्चात् व्रतीको चाहिये कि फिर ध्यानपूर्वक षोडशोपचार विधिसे भगवती सरस्वतीका पूजन करे। हे सौम्य ! सरस्वती पूजाके लिये उपयोगी जो कुछ नैवेद्य वेदोंमें बताये गये हैं और जैसा मैंने आगमशास्त्रमें अध्ययन किया है, उसे आपको बता रहा हूँ-मक्खन, दही, दूध, धानका लावा, तिलका लड्डू, सफेद गन्ना, गन्नेका रस, उसे पकाकर बनाया हुआ गुड़, मधु, स्वस्तिक (एक प्रकारका पक्वान्न), शक्कर, सफेद धानका बिना टूटा हुआ चावल (अक्षत), बिना उबाले हुए श्वेत धानका चिउड़ा, सफेद लड्डू, घी और सेंधा नमक डालकर बनाया गया शास्त्रोक्त हविष्यान्न, जौ अथवा गेहूँके आटेसे घृतमें तले हुए पदार्थ, स्वस्तिक तथा पके हुए केलेका पिष्टक, उत्तम अन्नको घृतमें पकाकर उससे बना हुआ अमृततुल्य मधुर मिष्टान्न, नारियल, नारियलका जल, कसेरु, मूली, अदरक, पका हुआ केला, सुन्दर बेल, बेरका फल, देश और कालके अनुसार उपलब्ध सुन्दर, श्वेत और पवित्र ऋतुफल- ये नैवेद्य (प्रशस्त) हैँ ।। 35 - 42 ।।

हे मुने! सुगन्धित श्वेत पुष्प, सुगन्धित श्वेत चन्दन, नवीन श्वेत वस्त्र तथा सुन्दर शंख, श्वेत पुष्पोंकी माला, श्वेत वर्णका हार तथा आभूषण भगवती सरस्वतीको अर्पण करने चाहिये ॥ 433 ॥ हे महाभाग ! भगवती सरस्वतीका जैसा ध्यान वेदमें वर्णित है; उस प्रशंसनीय, सुननेमें सुन्दर तथा भ्रमका नाश करनेवाले ध्यानके विषयमें सुनिये ॥ 443 ॥

'मैं भक्तिपूर्वक शुक्ल वर्णवाली, मुसकानयुक्त, अत्यन्त मनोहर, करोड़ों चन्द्रमाकी प्रभाको तिरस्कृत | करनेवाले परिपुष्ट तथा श्रीसम्पन्नविग्रहवाली, अग्निसदृश विशुद्ध वस्त्र धारण करनेवाली, हाथमें वीणा तथा पुस्तक धारण करनेवाली, उत्कृष्ट कोटिके रत्नोंसे निर्मित नवीन आभूषणोंसे विभूषित, ब्रह्मा-विष्णु | शिव आदि देवगणोंसे सम्यक् पूजित तथा मुनीश्वरों, मनुगण और मनुष्योंसे वन्दित भगवती सरस्वतीकी वन्दना करता हूँ' - इस प्रकार ध्यान करके विद्वान् | पुरुष समस्त पूजन-सामग्री मूलमन्त्रसे विधिपूर्वकसरस्वतीको अर्पण करके स्तुति करे और कवचको धारण करके दण्डकी भाँति भूमिपर गिरकर सरस्वतीको प्रणाम करे। हे मुने! ये सरस्वती जिन लोगोंकी इष्ट देवी हैं, उनके लिये तो यह नित्यक्रिया है। अन्य सभी लोगोंको विद्यारम्भके अवसरपर वर्षक अन्तमें तथा पंचमी तिथिको यह आराधना अवश्य करनी चाहिये ॥ 45 - 49 ॥

वैदिक अष्टाक्षर मूल मन्त्र परम श्रेष्ठ तथा सबके लिये उपयोगी है। अथवा जिन्हें जिसने जिस मन्त्रका उपदेश दिया है, उनके लिये वही मूल मन्त्र है। सरस्वती- इस शब्दके अन्तमें चतुर्थी तथा अन्तमें 'स्वाहा' लगाकर सबके आदिमें लक्ष्मीबीज और मायाबीज लगाकर बना हुआ यह मन्त्र 'श्रीं ह्रीं सरस्वत्यै स्वाहा' कल्पवृक्षके समान है ॥ 50-513 ॥

प्राचीन कालमें कृपानिधि भगवान् नारायणने पुण्यक्षेत्र भारतवर्षमें गंगाके तटपर वाल्मीकिको यह मन्त्र प्रदान किया था। इसी प्रकार भृगुमुनिने पुष्करक्षेत्रमें सूर्यग्रहणपर्वके अवसरपर यह मन्त्र शुक्राचार्यको प्रदान किया, मारीच (कश्यप) ने चन्द्रग्रहणके समयपर प्रसन्न होकर बृहस्पतिको इसका उपदेश किया और ब्रह्माजीने भृगुसे सन्तुष्ट होकर बदरिकाश्रममें उन्हें यह मन्त्र दिया था ॥ 52 - 54 ॥

जरत्कारुमुनिने क्षीरसागरके समीप आस्तिकको यह मन्त्र दिया था और विभाण्डकमुनिने मेरुपर्वतपर बुद्धिमान् ऋष्यश्रृंगको इसका उपदेश दिया था। भगवान् शिवने आनन्दित होकर कणादमुनि तथा गौतमको यह मन्त्र प्रदान किया था और सूर्यने याज्ञवल्क्य तथा कात्यायनको इस मन्त्रका उपदेश किया था। शेषनागने सुतल लोकमें बलिकी सभामें पाणिनि, बुद्धिमान् भारद्वाज और शाकटायनको यह मन्त्र दिया था ॥ 55-57॥

चार लाख जप कर लेनेसे यह मन्त्र मनुष्योंके लिये सिद्ध हो जाता है। यदि मनुष्य इस मन्त्रमें सिद्ध हो जाय, तो वह बृहस्पतिके समान हो जाता है ॥ 58 ॥

हे विप्रवर! अब आप विश्वपर विजय प्राप्त करानेवाले सरस्वतीकवचके विषयमें सुनिये, जिसे पूर्वकालमें जगत्‌का सृजन करनेवाले ब्रह्माजीने गन्धमादनपर्वतपर भृगुमुनिको प्रदान किया था ॥ 59 ॥भृगु बोले- ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ, ब्रह्मज्ञानमें पारंगत, सब कुछ जाननेवाले, सबकी सृष्टि करनेवाले, सबके स्वामी तथा सभीके द्वारा पूजित हे ब्रह्मन्! हे प्रभो! आप मुझे मन्त्रोंके समूहसे युक्त तथा परम पवित्र 'विश्वजय' नामक सरस्वती कवच बतलाइये ॥ 60-61 ॥

ब्रह्माजी बोले- हे वत्स ! सुनिये; मैं आपसे सम्पूर्ण कामनाओंको पूर्ण करनेवाले, वेदोंके सारस्वरूप, कानोंको सुख देनेवाले, वेदप्रतिपादित तथा वेदपूजित कवचका वर्णन करूँगा। रासेश्वर भगवान् श्रीकृष्णने गोलोक वृन्दावनमें रासलीलाके अवसरपर रासमण्डलमें मुझे यह कवच बताया था ॥ 62-63 ॥

हे ब्रह्मन् ! यह कवच परम गोपनीय, कल्पवृक्षके समान श्रेष्ठ तथा न सुने हुए अद्भुत मन्त्रसमूहोंसे युक्त है, जिसे धारण करके भगवान् शुक्राचार्य समस्त दैत्योंके पूज्य बन गये और जिसे धारण करके इसका पाठ करनेसे बृहस्पति परम बुद्धिमान् हो गये । 64-65 ॥

इसी प्रकार इस कवचके धारण करने तथा इसका पाठ करनेसे वाल्मीकिमुनि विद्वान् तथा कवीश्वर हो गये और स्वायम्भुव मनु इसे धारण करके सभीके पूज्य हो गये ॥ 66 ॥

इस कवचको धारण करके ही स्वयं कणाद, गौतम, कण्व, पाणिनि, शाकटायन, दक्ष और कात्यायन ग्रन्थ-रचना करनेमें समर्थ हुए ॥ 67 ॥

इसी प्रकार स्वयं कृष्णद्वैपायन व्यासजीने भी इसे धारण करके लीलामात्रमें वेदोंका विभाग तथा सम्पूर्ण पुराणोंका प्रणयन किया ॥ 68 ॥

शातातप, संवर्त, वसिष्ठ, पराशर तथा याज्ञवल्क्यने इसे धारण करके इसके पाठसे ग्रन्थ-रचना की। इसी प्रकार ऋष्यशृंग, भरद्वाज, आस्तिक, देवल, जैगीषव्य और ययाति इस कवचको धारण करके सर्वत्र पूजित हुए ।। 69-70 ।।

हे विप्रेन्द्र ! इस कवचके ऋषि स्वयं प्रजापति ही हैं इसका छन्द बृहती है और देवता माता शारदा हैं। | सभी तत्त्वोंके परिज्ञान करनेमें, सम्पूर्ण अर्थोंके साधनमें तथा सभी कविताओंके विवेचनमें इस कवचका विनियोग बताया गया है ।। 71-72 ।।

'श्रीं ह्रीं सरस्वत्यै स्वाहा' - यह मन्त्र सभी ओरसे मेरे सिरकी रक्षा करे। 'श्रीं वाग्देवतायै स्वाहा' - यह मन्त्र सदा मेरे ललाटकी रक्षा करे ॥ 73 ॥ 'ॐ ह्रीं सरस्वत्यै स्वाहा'- यह मन्त्र मेरे दोनों कानोंकी निरन्तर रक्षा करे और 'ॐ श्रीं ह्रीं भगवत्यै सरस्वत्यै स्वाहा'- यह मन्त्र मेरे दोनों नेत्रोंकी सदा रक्षा करे ।। 74 ॥

'ऐं ह्रीं वाग्वादिन्यै स्वाहा'- यह मन्त्र मेरी नासिकाकी सदा रक्षा करे और 'ह्रीं विद्याधिष्ठातृदेव्यै स्वाहा' - यह मन्त्र सदा मेरे ओष्ठकी रक्षा करे ।। 75 ।। 'ॐ श्रीं ह्रीं ब्राह्मयै स्वाहा' - यह मन्त्र मेरी दन्तपंक्तिकी सदा रक्षा करे और 'ऐं' यह एकाक्षरमन्त्र मेरे कण्ठकी सदा रक्षा करे ।। 76 ।।

'ॐ श्रीं ह्रीं' - यह मन्त्र मेरी गर्दनकी रक्षा करे तथा 'श्रीं' - यह मन्त्र मेरे दोनों कन्धोंकी सदा रक्षा करे। 'ॐ ह्रीं विद्याधिष्ठातृदेव्यै स्वाहा' - यह मन्त्र सदा मेरे वक्षःस्थलकी रक्षा करे ॥ 77 ॥

'ह्रीं विद्याधिस्वरूपायै स्वाहा' - यह मन्त्र मेरी नाभिकी रक्षा करे और 'ॐ ह्रीं क्लीं वाण्यै स्वाहा' – यह मन्त्र सदा मेरे दोनों हाथोंकी रक्षा करे ।। 78 ।।

ॐ सर्ववर्णात्मिकायै [ स्वाहा ] - यह मन्त्र मेरे दोनों पैरोंकी सदा रक्षा करे और 'ॐ वागधिष्ठातृदेव्यै स्वाहा' - यह मन्त्र सदा मेरे सम्पूर्ण शरीरकी रक्षा करे ॥ 79 ॥

'ॐ सर्वकण्ठवासिन्यै स्वाहा' - यह मन्त्र पूर्व दिशामें सदा मेरी रक्षा करे और ॐ सर्वजिह्वा ग्रवासिन्यै स्वाहा' - यह मन्त्र अग्निकोणमें मेरी रक्षा करे ॥ 80 ॥

'ॐ ऐं ह्रीं क्लीं सरस्वत्यै बुधजनन्यै स्वाहा' - यह मन्त्रराज दक्षिण दिशामें सर्वदा निरन्तर मेरी रक्षा करे ॥ 81 ॥

'ऐं ह्रीं श्रीं'- यह त्र्यक्षर मन्त्र नैर्ऋत्य कोणमें सदा मेरी रक्षा करे और 'ॐ ऐं जिह्वाग्रवासिन्यै स्वाहा' - यह मन्त्र पश्चिम दिशामें मेरी रक्षा करे ॥ 82 ॥'ॐ सर्वाम्बिकायै स्वाहा'- यह मन्त्र वायव्यकोणमें सदा मेरी रक्षा करे और 'ॐ ऐं श्रीं क्लीं गद्यवासिन्यै स्वाहा' - यह मन्त्र सदा उत्तर दिशामें मेरी रक्षा करे ॥ 83 ॥

ॐ ऐं सर्वशास्त्रवासिन्यै स्वाहा' - यह मन्त्र ईशानकोणमें सदा मेरी रक्षा करे और 'ॐ ह्रीं सर्वपूजितायै स्वाहा' - यह मन्त्र ऊपरसे सदा मेरी रक्षा करे ॥ 84 ॥

ॐ ह्रीं पुस्तकवासिन्यै स्वाहा' - यह मन्त्र नीचेसे सदा मेरी रक्षा करे। 'ॐ ग्रन्थबीजस्वरूपायै स्वाहा' - यह मन्त्र सब ओरसे मेरी रक्षा करे ॥ 85 ॥ हे विप्र! मैंने आपको ब्रह्ममन्त्रसमूहके विग्रहरूप

इस सरस्वतीकवचको बतला दिया। 'विश्वजय' नामक यह कवच साक्षात् ब्रह्मस्वरूप है ॥ 86 ॥ पूर्व कालमें मैंने गन्धमादनपर्वतपर धर्मदेवके मुखसे यह कवच सुना था। आपके स्नेहके कारण मैंने आपको इसे बतलाया है। किसी अन्य व्यक्तिको इसे नहीं बताना चाहिये ॥ 87 ॥

विद्वान् पुरुषको चाहिये कि नानाविध वस्त्र, अलंकार तथा चन्दनसे भलीभाँति गुरुकी पूजा करके | दण्डकी भाँति जमीनपर गिरकर प्रणाम करे और इसके बाद इस कवचको धारण करे ॥ 88 ॥

पाँच लाख जप कर लेनेसे यह कवच सिद्ध हो जाता है। इस कवचको यदि साधक सिद्ध कर ले तो वह बृहस्पतिके समान हो जाता है। इस कवचके प्रसादसे मनुष्य महान् वक्ता, कवियोंका सम्राट् तथा तीनों लोकोंपर विजय प्राप्त करनेवाला हो जाता है और वह सब कुछ जीत लेनेमें समर्थ हो जाता है ।। 89-90 ।।

हे मुने! मैंने कण्वशाखाके अन्तर्गत वर्णित यह सरस्वती कवच आपको बतला दिया। अब आप | सरस्वतीके स्तोत्र, पूजाविधान, ध्यान तथा वन्दनके विषयमें सुनिये ॥ 91 ॥

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देवी भागवत महापुराण
Index


  1. [अध्याय 1] प्रकृतितत्त्वविमर्श प्रकृतिके अंश, कला एवं कलांशसे उत्पन्न देवियोंका वर्णन
  2. [अध्याय 2] परब्रह्म श्रीकृष्ण और श्रीराधासे प्रकट चिन्मय देवताओं एवं देवियोंका वर्णन
  3. [अध्याय 3] परिपूर्णतम श्रीकृष्ण और चिन्मयी राधासे प्रकट विराट्रूप बालकका वर्णन
  4. [अध्याय 4] सरस्वतीकी पूजाका विधान तथा कवच
  5. [अध्याय 5] याज्ञवल्क्यद्वारा भगवती सरस्वतीकी स्तुति
  6. [अध्याय 6] लक्ष्मी, सरस्वती तथा गंगाका परस्पर शापवश भारतवर्षमें पधारना
  7. [अध्याय 7] भगवान् नारायणका गंगा, लक्ष्मी और सरस्वतीसे उनके शापकी अवधि बताना तथा अपने भक्तोंके महत्त्वका वर्णन करना
  8. [अध्याय 8] कलियुगका वर्णन, परब्रह्म परमात्मा एवं शक्तिस्वरूपा मूलप्रकृतिकी कृपासे त्रिदेवों तथा देवियोंके प्रभावका वर्णन और गोलोकमें राधा-कृष्णका दर्शन
  9. [अध्याय 9] पृथ्वीकी उत्पत्तिका प्रसंग, ध्यान और पूजनका प्रकार तथा उनकी स्तुति
  10. [अध्याय 10] पृथ्वीके प्रति शास्त्र - विपरीत व्यवहार करनेपर नरकोंकी प्राप्तिका वर्णन
  11. [अध्याय 11] गंगाकी उत्पत्ति एवं उनका माहात्म्य
  12. [अध्याय 12] गंगाके ध्यान एवं स्तवनका वर्णन, गोलोकमें श्रीराधा-कृष्णके अंशसे गंगाके प्रादुर्भावकी कथा
  13. [अध्याय 13] श्रीराधाजीके रोषसे भयभीत गंगाका श्रीकृष्णके चरणकमलोंकी शरण लेना, श्रीकृष्णके प्रति राधाका उपालम्भ, ब्रह्माजीकी स्तुतिसे राधाका प्रसन्न होना तथा गंगाका प्रकट होना
  14. [अध्याय 14] गंगाके विष्णुपत्नी होनेका प्रसंग
  15. [अध्याय 15] तुलसीके कथा-प्रसंगमें राजा वृषध्वजका चरित्र- वर्णन
  16. [अध्याय 16] वेदवतीकी कथा, इसी प्रसंगमें भगवान् श्रीरामके चरित्रके एक अंशका कथन, भगवती सीता तथा द्रौपदी के पूर्वजन्मका वृत्तान्त
  17. [अध्याय 17] भगवती तुलसीके प्रादुर्भावका प्रसंग
  18. [अध्याय 18] तुलसीको स्वप्न में शंखचूड़का दर्शन, ब्रह्माजीका शंखचूड़ तथा तुलसीको विवाहके लिये आदेश देना
  19. [अध्याय 19] तुलसीके साथ शंखचूड़का गान्धर्वविवाह, शंखचूड़से पराजित और निर्वासित देवताओंका ब्रह्मा तथा शंकरजीके साथ वैकुण्ठधाम जाना, श्रीहरिका शंखचूड़के पूर्वजन्मका वृत्तान्त बताना
  20. [अध्याय 20] पुष्पदन्तका शंखचूड़के पास जाकर भगवान् शंकरका सन्देश सुनाना, युद्धकी बात सुनकर तुलसीका सन्तप्त होना और शंखचूड़का उसे ज्ञानोपदेश देना
  21. [अध्याय 21] शंखचूड़ और भगवान् शंकरका विशद वार्तालाप
  22. [अध्याय 22] कुमार कार्तिकेय और भगवती भद्रकालीसे शंखचूड़का भयंकर बुद्ध और आकाशवाणीका पाशुपतास्त्रसे शंखचूड़की अवध्यताका कारण बताना
  23. [अध्याय 23] भगवान् शंकर और शंखचूड़का युद्ध, भगवान् श्रीहरिका वृद्ध ब्राह्मणके वेशमें शंखचूड़से कवच माँग लेना तथा शंखचूड़का रूप धारणकर तुलसीसे हास-विलास करना, शंखचूड़का भस्म होना और सुदामागोपके रूपमें गोलोक पहुँचना
  24. [अध्याय 24] शंखचूड़रूपधारी श्रीहरिका तुलसीके भवनमें जाना, तुलसीका श्रीहरिको पाषाण होनेका शाप देना, तुलसी-महिमा, शालग्रामके विभिन्न लक्षण एवं माहात्म्यका वर्णन
  25. [अध्याय 25] तुलसी पूजन, ध्यान, नामाष्टक तथा तुलसीस्तवनका वर्णन
  26. [अध्याय 26] सावित्रीदेवीकी पूजा-स्तुतिका विधान
  27. [अध्याय 27] भगवती सावित्रीकी उपासनासे राजा अश्वपतिको सावित्री नामक कन्याकी प्राप्ति, सत्यवान् के साथ सावित्रीका विवाह, सत्यवान्की मृत्यु, सावित्री और यमराजका संवाद
  28. [अध्याय 28] सावित्री यमराज-संवाद
  29. [अध्याय 29] सावित्री धर्मराजके प्रश्नोत्तर और धर्मराजद्वारा सावित्रीको वरदान
  30. [अध्याय 30] दिव्य लोकोंकी प्राप्ति करानेवाले पुण्यकर्मोंका वर्णन
  31. [अध्याय 31] सावित्रीका यमाष्टकद्वारा धर्मराजका स्तवन
  32. [अध्याय 32] धर्मराजका सावित्रीको अशुभ कर्मोंके फल बताना
  33. [अध्याय 33] विभिन्न नरककुण्डों में जानेवाले पापियों तथा उनके पापोंका वर्णन
  34. [अध्याय 34] विभिन्न पापकर्म तथा उनके कारण प्राप्त होनेवाले नरकका वर्णन
  35. [अध्याय 35] विभिन्न पापकर्मोंसे प्राप्त होनेवाली विभिन्न योनियोंका वर्णन
  36. [अध्याय 36] धर्मराजद्वारा सावित्रीसे देवोपासनासे प्राप्त होनेवाले पुण्यफलोंको कहना
  37. [अध्याय 37] विभिन्न नरककुण्ड तथा वहाँ दी जानेवाली यातनाका वर्णन
  38. [अध्याय 38] धर्मराजका सावित्री से भगवतीकी महिमाका वर्णन करना और उसके पतिको जीवनदान देना
  39. [अध्याय 39] भगवती लक्ष्मीका प्राकट्य, समस्त देवताओंद्वारा उनका पूजन
  40. [अध्याय 40] दुर्वासाके शापसे इन्द्रका श्रीहीन हो जाना
  41. [अध्याय 41] ब्रह्माजीका इन्द्र तथा देवताओंको साथ लेकर श्रीहरिके पास जाना, श्रीहरिका उनसे लक्ष्मीके रुष्ट होनेके कारणोंको बताना, समुद्रमन्थन तथा उससे लक्ष्मीजीका प्रादुर्भाव
  42. [अध्याय 42] इन्द्रद्वारा भगवती लक्ष्मीका षोडशोपचार पूजन एवं स्तवन
  43. [अध्याय 43] भगवती स्वाहाका उपाख्यान
  44. [अध्याय 44] भगवती स्वधाका उपाख्यान
  45. [अध्याय 45] भगवती दक्षिणाका उपाख्यान
  46. [अध्याय 46] भगवती षष्ठीकी महिमाके प्रसंगमें राजा प्रियव्रतकी कथा
  47. [अध्याय 47] भगवती मंगलचण्डी तथा भगवती मनसाका आख्यान
  48. [अध्याय 48] भगवती मनसाका पूजन- विधान, मनसा-पुत्र आस्तीकका जनमेजयके सर्पसत्रमें नागोंकी रक्षा करना, इन्द्रद्वारा मनसादेवीका स्तवन करना
  49. [अध्याय 49] आदि गौ सुरभिदेवीका आख्यान
  50. [अध्याय 50] भगवती श्रीराधा तथा श्रीदुर्गाके मन्त्र, ध्यान, पूजा-विधान तथा स्तवनका वर्णन