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शिव पुराण (शिव महापुरण)

Shiv Purana (Shiv Mahapurana)

संहिता 2, खंड 1 (सृष्टि खण्ड) , अध्याय 15 - Sanhita 2, Khand 1 (सृष्टि खण्ड) , Adhyaya 15

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सृष्टिका वर्णन

नारदजी बोले - हे महाभाग ! हे विधे! हे देवश्रेष्ठ ! आप धन्य हैं। आपने आज यह शिवकी परमपावनी अद्भुत कथा सुनायी ॥ 1 ॥

इसमें सदाशिवकी लिंगोत्पत्तिकी जो कथा हमने सुनी है, वह महादिव्य, कल्याणकारी और अद्भुत है; जिसके प्रभावमात्रको ही सुनकर दुःख नष्ट हो जाते हैं ॥ 2 ॥

इस कथाके पश्चात् जो हुआ, उसका माहात्म्य और उसके चरित्रका वर्णन करें। यह सृष्टि किस प्रकारसे हुई, इसका भी आप विशेष रूपसे वर्णन करें ? ॥ 3 ॥ब्रह्माजी बोले- आपने यह उचित ही पूछा है। तदनन्तर जो हुआ और मैंने जैसा पहले सुना वैसा ही मैं संक्षेपमें कहूँगा ॥ 4 ॥

हे विप्रेन्द्र जब सनातनदेव शिव अपने स्वरूपमें अन्तर्धान हो गये, तब मैंने और भगवान् विष्णुने महान् सुखकी अनुभूति की ॥ 5 ॥

तदनन्तर हम दोनों - ब्रह्मा और विष्णुने अपने अपने हंस और वाराहरूपका परित्याग किया। सृष्टि संरचना और उसके पालनकी इच्छासे हमदोनों उस शिवकी मायाके दोनों प्रकारोंसे घिर गये ॥ 6 ॥

नारदजी बोले - हे विधे हे महाप्राज्ञ ब्रह्मन् ! मेरे हृदयमें महान् सन्देह है। अतुलनीय कृपा करके शीघ्र ही उसको नष्ट करें ॥ 7 ॥

अन्य रूपोंको छोड़कर आप दोनोंने हंस और वाराहका ही रूप क्यों धारण किया, इसका क्या कारण है ? बताइये ॥ 8 ॥

सूतजी बोले- महात्मा नारदजीका यह वचन सुनकर ब्रह्माने शिवके चरणारविन्दोंका स्मरण करके आदरपूर्वक यह कहना प्रारम्भ किया ॥ 9 ॥

ब्रह्माजी बोले- हंसकी निश्चल गति ऊपरकी और गमन करनेमें ही होती है। जल और दूधको पृथक-पृथक करनेके समान तत्व और अतत्त्वको भी जाननेमें वह समर्थ होता है ॥ 10 ॥

अज्ञान एवं ज्ञानके तत्त्वका विवेचन हंस ही कर सकता है। इसलिये सृष्टिकर्ता मुझ ब्रह्माने हंसका रूप धारण किया ॥ 11 ॥

हे नारद! प्रकाश स्वरूप शिवतत्त्वका विवेक वह हंसरूप प्राप्त न कर सका, अतः उसे छोड़ देना पड़ा ॥ 12 ॥

सृष्टिसंरचनाके लिये तत्पर प्रवृत्तिको ज्ञानकी प्राप्ति कैसे हो सकती है? जब हंसरूपमें मैं नहीं जान सका, तो मैंने उस रूपको छोड़ दिया ॥ 13 ॥

नीचेकी ओर जानेमें वाराहकी निश्चल गति होती है, इसलिये विष्णुने उस सदाशिव के अद्भुत लिंगके मूलभागमें पहुँचनेकी इच्छासे वाराहका ही रूप धारण किया । 14 ।।अथवा संसारका पालन करनेवाले विष्णुने वाराहकल्पको बनानेके लिये उस रूपको धारण किया ॥ 15 ॥

जिस दिन भगवान्ने उस रूपको धारण किया, उसी दिनसे वह [ श्वेत] वाराह संज्ञक कल्प प्रारम्भ हुआ था ॥ 16 ॥

अथवा उन महेश्वरकी जब यह इच्छा हुई कि विवादमें फँसे हम दोनोंके द्वारा हंस और वाराहका रूप धारण किया जाय, उसी दिनसे उस वाराह नामके कल्पका भी प्रादुर्भाव हुआ ॥ 17 ॥

हे नारद! सुनिये। मैंने इस प्रकारसे तुम्हारे प्रश्नोंका उत्तर प्रस्तुत कर दिया है। हे मुने! अब सदाशिवके चरणकमलका स्मरण करके मैं सृष्टिसृजनकी विधि बता रहा हूँ ॥ 18 ॥

[ ब्रह्माजी बोले- हे मुने!] जब महादेवजी अन्तर्धान हो गये, तब मैं उनकी आज्ञाका पालन करनेके लिये ध्यानमग्न हो कर्तव्यका विचार करने लगा ॥ 19 ॥

उस समय भगवान् शंकरको नमस्कार करके श्रीहरिसे ज्ञान पाकर, परमानन्दको प्राप्त होकर मैंने सृष्टि करनेका ही निश्चय किया। हे तात! भगवान् विष्णु भी वहाँ सदाशिवको प्रणाम करके मुझे उपदेश देकर तत्काल अदृश्य हो गये । ll 20-21 ॥

वे ब्रह्माण्ड से बाहर जाकर भगवान् शिवकी कृपा प्राप्त करके वैकुण्ठधाममें पहुँचकर सदा वहीं रहने लगे ॥ 22 ॥

मैंने सृष्टिकी इच्छासे भगवान् शिव और विष्णुका स्मरण करके पहले रचे हुए जलमें अपनी अंजलि डालकर जलको ऊपरकी ओर उछाला ॥ 23 ॥

इससे वहाँ चौबीस तत्त्वोंवाला एक अण्ड प्रकट हुआ। हे विप्र ! उस जलरूप अण्डको मैं देख भी न सका, इतनेमें वह विराट् आकारवाला हो गया ॥ 24 ॥

[उसमें चेतनता न देखकर] मुझे बड़ा संशय हुआ और मैं अत्यन्त कठोर तप करने लगा। बारह. वर्षोंतक में भगवान् विष्णुके चिन्तनमें लगा रहा ।। 25 ।

हे तात। उस समय के पूर्ण होनेपर भगवान् स्वयं प्रकट हुए और बड़े प्रेमसे मेरे अंगोंका स्पर्श करते हुए मुझसे प्रसन्नतापूर्वक कहने लगे-॥ 26 ॥विष्णु बोले- हे ब्रहान्। आप वर माँगिये। मैं प्रसन्न हूँ। मुझे आपके लिये कुछ भी अदेय नहीं है। भगवान् शिवकी कृपासे मैं सब कुछ देनेमें समर्थ हूँ ॥ 27 ॥

ब्रह्माजी बोले- हे महाभाग। आपने जो मुझपर कृपा की है, वह सर्वथा उचित ही है; क्योंकि भगवान् शंकरने मुझे आपके हाथोंमें सौंप दिया था। हे विष्णो! आपको नमस्कार है, आज मैं आपसे जो कुछ माँगता हूँ, उसे दीजिये ॥ 28 ॥

हे प्रभो यह विराट्रूप तथा चौबीस तत्त्वोंसे बना हुआ अण्ड किसी तरह चेतन नहीं हो रहा है, यह जड़ीभूत दिखायी देता है ॥ 29 ॥

हे हरे। इस समय भगवान् शिवकी कृपासे आप यहाँ प्रकट हुए हैं। अतः शंकरकी शक्तिसे सम्भूत इस अण्डमें चेतनता लाइये ॥ 30 ॥ मेरे ऐसा कहने पर शिवकी आज्ञा तत्पर रहनेवाले महाविष्णुने अनन्तरूपका आश्रय लेकर उस अण्डमें प्रवेश किया 31 ॥

उस समय उन परमपुरुषके सहस्रों मस्तक, सहस्रों नेत्र और सहस्रों पैर थे। उन्होंने भूमिको सब ओरसे घेरकर उस अण्डको व्याप्त कर लिया ॥ 32 ॥ मेरे द्वारा भलीभाँति स्तुति किये जानेपर जब श्रीविष्णुने उस अण्डमें प्रवेश किया, तब वह चौबीस तत्त्वोंवाला अण्ड सचेतन हो गया ॥ 33 ॥

पातालसे लेकर सत्यलोकतककी अवधिवाले उस अण्डके रूपमें वहाँ विराट् श्रीहरि ही विराज रहे थे ll 34ll

पंचमुख महादेवने केवल अपने रहनेके लिये सुरम्य कैलास- नगरका निर्माण किया, जो सब लोकोंसे ऊपर सुशोभित होता है ॥ 35 ll

हे देवर्षे सम्पूर्ण ब्रह्माण्डका नाश हो जानेपर भी वैकुण्ठ और कैलास-उन दोनोंका कभी नाश नहीं होता ॥ 36ll

हे मुनिश्रेष्ठ मैं सत्यलोकका आश्रय लेकर रहता हूँ। हे तात! महादेवजीकी आज्ञासे ही मुझमें सृष्टि रचनेकी इच्छा उत्पन्न हुई है ।। 37 ॥हे तात! जब मैं सृष्टिको इच्छासे चिन्तन करते लगा, उस समय पहले मुझसे पापपूर्ण तमोगुणी | सृष्टिका प्रादुर्भाव हुआ, जिसे अविद्यापंचक (पंचपर्वा अविद्या) कहते हैं ॥ 38 ॥

उसके पश्चात् प्रसन्नचित्त मैंने स्थावरसंज्ञक मुख्य सगं (पहले सर्ग) की संरचना की, जो सृष्टि सामर्थ्यसे रहित था, पुनः शिवकी आज्ञासे मैंने ध्यान किया ।। 39 ।।

उस मुख्य सर्गको वैसा देखकर अपना कार्य साधनेके लिये सृष्टि करनेके इच्छुक मैंने दुःखये | परिपूर्ण तिर्यक्त्रोत [तिरछे उड़नेवाले] सर्ग (दूसरे सर्ग) का सृजन किया, वह भी पुरुषार्थसाधक नहीं था ॥ 40 ॥

उसे भी पुरुषार्थसाधनकी शक्तिसे रहित जानकर जब मैं पुनः सृष्टिका चिन्तन करने लगा, तब मुझसे शीघ्र ही (तीसरे) सात्त्विक सर्गका प्रादुर्भाव हुआ, जिसे ऊर्ध्वस्रोता कहते हैं । ll 41 ।।

यह देवसर्गके नामसे विख्यात हुआ। यह देवसर्ग सत्यवादी तथा अत्यन्त सुखदायक है। उसे भी पुरुषार्थसाधनसे रहित मानकर मैंने अन्य सर्गके लिये अपने स्वामी श्रीशिवका चिन्तन आरम्भ किया ॥ 42 ॥

तब भगवान् शंकरकी आज्ञासे एक रजोगुणी सृष्टिका प्रादुर्भाव हुआ, जिसे अर्वाक्सोता (चौथा सर्ग) कहा गया है, जो मनुष्य सर्ग कहलाता है, वह सर्ग पुरुषार्थसाधनका अधिकारी हुआ ll 43 ll

तदनन्तर महादेवजी की आज्ञासे भूत आदिकी सृष्टि [भूतसर्ग पाँचवाँ सर्ग] हुई। इस प्रकार मैंने पाँच प्रकारकी सृष्टि की ॥ 44 ॥

इनके अतिरिक्त तीन प्रकारके सर्ग मुझ ब्रह्मा और प्रकृतिके सान्निध्यसे उत्पन्न हुए। इनमें पहला महत्तत्त्वका सर्ग है, दूसरा सूक्ष्म भूतों अर्थात् तन्मात्राओंका सर्ग और तीसरा वैकारिक सर्ग कहलाता है। इस तरह ये तीन प्राकृत सर्ग हैं। प्राकृत और वैकृत दोनों प्रकारके सगको मिलानेसे आठ सर्ग होते हैं ।। 45-46 ।।

इनके अतिरिक्त नौवाँ कौमारसर्ग है, जो प्राकृत और वैकृत भी है। इन सबके अवान्तर भेद हैं, जिनका वर्णन मैं नहीं कर सकता। उसका उपयोग बहुत थोड़ाहै। अब मैं द्विजात्मक सर्गका वर्णन कह रहा हूँ। इसीका दूसरा नाम कौमारसर्ग है, जिसमें सनक सनन्दन आदि कुमारोंकी महान् सृष्टि हुई है ।। 47-48 ।।

सनक आदि मेरे पाँच मानसपुत्र हैं, जो मुझ ब्रह्माके ही समान हैं। वे महान् वैराग्यसे सम्पन्न तथा उत्तम व्रतका पालन करनेवाले हुए ।। 49 ।।

उनका मन सदा भगवान् शिवके चिन्तनमें ही लगा रहता है वे संसारसे विमुख एवं ज्ञानी हैं। उन्होंने मेरे आदेश देनेपर भी सृष्टिके कार्य में मन नहीं लगाया ॥ 50 ll

हे मुनिश्रेष्ठ! सनकादि कुमारोंके दिये हुए नकारात्मक उत्तरको सुनकर मैंने बड़ा भयंकर क्रोध प्रकट किया। किंतु हे नारद! मुझे मोह हो गया ।। 51 ।।

हे मुने! क्रोध और मोहसे विह्वल मुझ ब्रह्माके नेत्रों क्रोधवश आँसूकी बूँदें गिरने लगीं ॥ 52 ॥

उस अवसरपर मैंने मन-ही-मन भगवान् विष्णुका स्मरण किया। वे शीघ्र ही आ गये और समझाते हुए मुझसे कहने लगे- ॥ 53 ॥

आप भगवान् शिवकी प्रसन्नताके लिये तपस्या कीजिये। हे मुनिश्रेष्ठ ! श्रीहरिने जब मुझे ऐसी शिक्षा दी, तब मैं महाघोर एवं उत्कृष्ट तप करने लगा ॥ 54 ॥

सृष्टिके लिये तपस्या करते हुए मेरी दोनों भौंहों और नासिका के मध्यभागसे जो उनका अपना ही अविमुक्त नामक स्थान है, महेश्वरकी तीन मूर्तियों में अन्यतम, पूर्णाश, सर्वेश्वर एवं दयासागर भगवान् शिव अर्धनारीश्वररूपमें प्रकट हुए ।। 55-56 ॥

जो जन्मसे रहित, तेजकी राशि, सर्वज्ञ तथा सर्वकर्ता हैं, उन नीललोहित नामधारी भगवान् उमावल्लभको सामने देखकर बड़ी भक्तिसे मस्तक झुकाकर उनकी स्तुति करके मैं बड़ा प्रसन्न हुआ और उन देवदेवेश्वरसे बोला- हे प्रभो! आप विविध जीवोंकी सृष्टि करें ॥57-58 ॥

मेरी यह बात सुनकर उन देवाधिदेव महेश्वर रुद्रने अपने ही समान बहुत से रुद्रगणोंकी सृष्टि की ।। 59 ।।तब मैंने स्वामी महेश्वर महारुद्रसे फिर कहा हे देव! आप ऐसे जीवोंकी सृष्टि करें, जो जन्म और मृत्युके भयसे युक्त हों ॥ 60 ॥

हे मुनिश्रेष्ठ! मेरी ऐसी बात सुनकर करुणासागर महादेवजी हँसकर मुझसे कहने लगे - ॥ 61 ॥

महादेवजी बोले- विधे ! मैं जन्म और मृत्युके भयसे युक्त अशोभन जीवोंकी सृष्टि नहीं करूँगा; क्योंकि वे कर्मोंके अधीन होकर दुःखके समुद्रमें डूबे रहेंगे ॥ 62 ॥

मैं तो गुरुका स्वरूप धारण करके उत्तम ज्ञान प्रदानकर दुःखके सागरमें डूबे हुए उन जीवोंका उद्धारमात्र करूँगा, उन्हें पार करूँगा ॥ 63॥

हे प्रजापते! दुःखमें डूबे हुए समस्त जीवोंकी सृष्टि तो आप करें। मेरी आज्ञासे इस कार्यमें प्रवृत्त होनेके कारण आपको माया नहीं बाँध सकेगी ॥ 64 ॥

ब्रह्माजी बोले- मुझसे ऐसा कहकर श्रीमान् भगवान् नीललोहित महादेव मेरे देखते-ही-देखते अपने पार्षदोंके साथ तत्काल अन्तर्धान हो गये ॥ 65 ॥

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शिव पुराण
Index


  1. [अध्याय 1] ऋषियोंके प्रश्नके उत्तरमें श्रीसूतजीद्वारा नारद -ब्रह्म -संवादकी अवतारणा
  2. [अध्याय 2] नारद मुनिकी तपस्या, इन्द्रद्वारा तपस्यामें विघ्न उपस्थित करना, नारदका कामपर विजय पाना और अहंकारसे युक्त होकर ब्रह्मा, विष्णु और रुद्रसे अपने तपका कथन
  3. [अध्याय 3] मायानिर्मित नगरमें शीलनिधिकी कन्यापर मोहित हुए नारदजीका भगवान् विष्णुसे उनका रूप माँगना, भगवान्‌का अपने रूपके साथ वानरका सा मुँह देना, कन्याका भगवान्‌को वरण करना और कुपित हुए नारदका शिवगणोंको शाप देना
  4. [अध्याय 4] नारदजीका भगवान् विष्णुको क्रोधपूर्वक फटकारना और शाप देना, फिर मायाके दूर हो जानेपर पश्चात्तापपूर्वक भगवान्‌के चरणोंमें गिरना और शुद्धिका उपाय पूछना तथा भगवान् विष्णुका उन्हें समझा-बुझाकर शिवका माहात्म्य जाननेके लिये ब्रह्माजीके पास जानेका आदेश और शिवके भजनका उपदेश देना
  5. [अध्याय 5] नारदजीका शिवतीर्थोंमें भ्रमण, शिवगणोंको शापोद्धारकी बात बताना तथा ब्रह्मलोकमें जाकर ब्रह्माजीसे शिवतत्त्वके विषयमें प्रश्न करना
  6. [अध्याय 6] महाप्रलयकालमें केवल सबाकी सत्ताका प्रतिपादन, उस निर्गुण-निराकार ब्रह्मसे ईश्वरमूर्ति (सदाशिव) का प्राकट्य, सदाशिवद्वारा स्वरूपभूत शक्ति (अम्बिका ) - का प्रकटीकरण, उन दोनोंके द्वारा उत्तम क्षेत्र (काशी या आनन्दवन ) का प्रादुर्भाव, शिवके वामांगसे परम पुरुष (विष्णु) का आविर्भाव तथा उनके सकाशसे प्राकृत तत्त्वोंकी क्रमशः उत्पत्तिका वर्णन
  7. [अध्याय 7] भगवान् विष्णुकी नाभिसे कमलका प्रादुर्भाव, शिवेच्छासे ब्रह्माजीका उससे प्रकट होना, कमलनालके उद्गमका पता लगानेमें असमर्थ ब्रह्माका तप करना, श्रीहरिका उन्हें दर्शन देना, विवादग्रस्त ब्रह्मा-विष्णुके बीचमें अग्निस्तम्भका प्रकट होना तथा उसके ओर छोरका पता न पाकर उन दोनोंका उसे प्रणाम करना
  8. [अध्याय 8] ब्रह्मा और विष्णुको भगवान् शिवके शब्दमय शरीरका दर्शन
  9. [अध्याय 9] उमासहित भगवान् शिवका प्राकट्य उनके द्वारा अपने स्वरूपका विवेचन तथा ब्रह्मा आदि तीनों देवताओंकी एकताका प्रतिपादन
  10. [अध्याय 10] श्रीहरिको सृष्टिकी रक्षाका भार एवं भोग-मोक्ष-दानका अधिकार देकर भगवान् शिवका अन्तर्धान होना
  11. [अध्याय 11] शिवपूजनकी विधि तथा उसका फल
  12. [अध्याय 12] भगवान् शिवकी श्रेष्ठता तथा उनके पूजनकी अनिवार्य आवश्यकताका प्रतिपादन
  13. [अध्याय 13] शिवपूजनकी सर्वोत्तम विधिका वर्णन
  14. [अध्याय 14] विभिन्न पुष्पों, अन्नों तथा जलादिकी धाराओंसे शिवजीकी पूजाका माहात्म्य
  15. [अध्याय 15] सृष्टिका वर्णन
  16. [अध्याय 16] ब्रह्माजीकी सन्तानोंका वर्णन तथा सती और शिवकी महत्ताका प्रतिपादन
  17. [अध्याय 17] यज्ञदत्तके पुत्र गुणनिधिका चरित्र
  18. [अध्याय 18] शिवमन्दिरमें दीपदानके प्रभावसे पापमुक्त होकर गुणनिधिका दूसरे जन्ममें कलिंगदेशका राजा बनना और फिर शिवभक्तिके कारण कुबेर पदकी प्राप्ति
  19. [अध्याय 19] कुबेरका काशीपुरीमें आकर तप करना, तपस्यासे प्रसन्न उमासहित भगवान् विश्वनाथका प्रकट हो उसे दर्शन देना और अनेक वर प्रदान करना, कुबेरद्वारा शिवमैत्री प्राप्त करना
  20. [अध्याय 20] भगवान् शिवका कैलास पर्वतपर गमन तथा सृष्टिखण्डका उपसंहार