अनमोल वचन - सत्संग के मोती (Pearls of wisdom) [सत्संग Quotes]



ईश्वरके आश्रित मनुष्योंके तीन लक्षण होते हैं— (1) उसके विचारोंका प्रवाह ईश्वरकी ओर ही बहता है, (2) ईश्वरमें ही उसकी स्थिति होती है और (3) ईश्वरकी प्रीतिके लिये ही उसके सारे कार्य होते हैं।


जहाँतक बन सके, बाहरके पापोंसे बिलकुल बचकर भगवान्का भजन करो। जीवन बहुत थोड़ा है, विचारोंमें ही बिता दोगे तो भजनसे वंचित रह जाओगे।


मातृस्तनमें मुँह लगाते ही माताके दूध भर आता है। माँ-बच्चे दोनों लाड़ लड़ाते हुए एक दूसरेकी इच्छा पूरी करते हैं, पर सारा भार है माताके सिर।


धन, स्त्री और पुत्रोंमें ही चित्त लगा रखा है; विपत्तिमें काम आनेवाले मित्र भगवान्‌की खोज क्यों नहीं करता।


जिस मनुष्यकी अच्छे कर्म करनेपर भी निन्दा होती है, वह बड़ा भाग्यवान् है।


चारके संगसे बचनेकी चेष्टा रखो - नास्तिक, अन्यायका धन, जवान स्त्री और दूसरेकी बुराई।


मूड़ मुड़ाते अनेक दिन हो गये; पर आजतक भगवान् न मिले। मिलें कैसे मन राममें लगे, तब तो राम मिलें? मन तो विषय-भोगों में लगा रहता है, फिर राम मिलें कैसे।


पत्थरकी ही सीढ़ी और पत्थरकी ही देव-प्रतिमा, परंतु एकपर हम पैर रखते हैं और दूसरेकी पूजा करते हैं। भाव ही भगवान् हैं।


सभी शास्त्रोंका सार यही है कि श्रीकृष्णकीर्तन और नामस्मरण ही संसारमें सुखका सर्वश्रेष्ठ साधन है। प्रेमकी उपलब्धि नामस्मरणसे ही हो सकती है।


जहाँ कोई आशा न रही, वहीं भगवान् रहते हैं। आशाको जड़से उखाड़कर फेंक दे।


सोलह हजार तुम बन सकते हो, सोलह हजार नारियोंके लिये तुम सोलह हजार रूप धारण कर सकते हो, पर इस अधमके लिये एक रूप धारण करना भी तुम्हारे लिये इतना कठिन हो गया है।


दया, नम्रता, दीनता, क्षमा, शील और संतोष - इन छः को धारण करके जो भगवान्‌को स्मरण करता है वह निश्चय ही मोक्ष पाता है।


अपने निर्वाहके लिये जो चिन्ता अथवा प्रपंच नहीं करता वही सच्चा विश्वासी है।


इन्द्र और चींटी दोनों देहतः समान ही हैं। देहमात्र ही नश्वर है। सबके शरीर नाशवान् हैं। शरीरका पर्दा हटाकर देखो तो सर्वत्र भगवान् ही हैं। भगवान्‌के सिवा और क्या है? अपनी दृष्टि चिन्मय हो तो सर्वत्र श्रीहरि ही हैं।


सभी मनुष्य जन्म-जन्मान्तरमें कभी-न-कभी भगवान्‌को देखेंगे ही।


चाहे जैसी बुरी से बुरी अवस्थामें भी प्रभुपर जरा भी दोषारोपण न करो तो समझो कि तुम्हारा प्रभुपर विश्वास है।


प्रेम सदा ही सहिष्णु और मधुर है। प्रेममें द्वेष, आत्मश्लाघा, गर्व, अनिष्ट आचरण, स्वार्थ, क्रोध, अपकार और अधर्म नहीं होता।


अनन्त ब्रह्माण्ड जिसके उदरमें हैं, वह हरि नन्दके घर बालक हैं।


अपने सब कर्मफल ईश्वरको अर्पण कर दो। अपने लिये किसी फलकी कामना न करो।


अपने नामकी बड़ाई चाहनेमें विरक्त भी फँस जाते हैं और अपना दोष प्रकट करनेवाले फँसे भी छूट जाते हैं।


संसारसे अलग रहना ही उत्तम है, यहाँके सम्बन्धोंकी जड़में दुःख और कष्ट भरा है। जिसने अपना जीवन चुपचाप बिता दिया, सच तो यह है कि उसीका जीवन उत्तम बीता।


एक प्रभुका सदैव स्मरण रखो, मनुष्योंकी बातें रहने दो।


सहज ही अपने पास आनेवाले जिज्ञासुओंको अवकाशके अनुसार उपदेश करो, परंतु उपदेशके लिये ही कमर कसकर न बैठो। ऐसा करना अपने अमूल्य समयको खोना है।


जबतक हृदयमें विकार है, विषाद है, भय है और अविश्वास है, तबतक श्रद्धा और भक्ति दृढ़ नहीं हो सकती।


साधनावस्थामें ऐसे मनुष्योंसे, जो उपासनासे ठट्टा करते हैं, धर्म तथा धार्मिकोंकी निन्दा करते हैं, एकदम दूर रहना चाहिये।


श्रीकृष्णके मनोहर नामोंका ही स्मरण करते रहना चाहिये। श्रीकृष्ण-कथाओंके अतिरिक्त अन्य कोई भी संसारी बातें न सुननी चाहिये। खाते कृष्ण, पीते कृष्ण, चलते कृष्ण, उठते कृष्ण, बैठते कृष्ण, हँसते कृष्ण, रोते कृष्ण- इस प्रकार सदा कृष्ण-कृष्ण ही कहते रहना चाहिये।


ममताका नाश ही दुःखनाशका उपाय है। ममता होती है अज्ञानसे । अतः ज्ञानके अथवा भक्तिके द्वारा अज्ञानको नष्ट करना उचित है।


जीकी बड़ी साध यही है कि तुम्हारे चरणोंसे भेंट हो। इस निरन्तर वियोगसे चित्त अत्यन्त व्याकुल है।


शरीर अनित्य है, ऐश्वर्य अनित्य है, मृत्यु सदैव पास है, इसलिये धर्म करो।


प्रसन्नता, आत्मानुभव, परमशान्ति, तृप्ति, आनन्द और परमात्मामें स्थिति-ये विशुद्ध सत्त्वगुणके धर्म हैं। इनसे मुमुक्षु पुरुष नित्यानन्द-रसको प्राप्त करता है।


अचरजकी बात है! तेरा प्यारा मित्र तेरे समीप भी है और अनुकूल भी है, फिर भी तेरी यह हालत।


सबसे बड़े भगवान् हैं, परन्तु उनकी बड़ाई भी तभी फैली जब भृगुजीके लातको उन्होंने खुशी-खुशी सह लिया।


जो दूसरेके अवगुणकी चर्चा करता है, वह अपना अवगुण प्रकट करता है।


चैतन्यरूप वस्त्रसे युक्त महाभाग्यवान् पुरुष वस्त्रहीन, वस्त्रयुक्त अथवा मृगचर्मादि धारणकर उन्मत्तके समान, बालकके समान अथवा पिशाचादिके समान स्वेच्छानुसार भूमण्डलमें विचरते रहते हैं।


-अनुताप करते हुए भगवान्से यह कहो, मैं तो अनाथ हूँ, अपराधी हूँ, कर्महीन हूँ, मन्दगति और जडबुद्धि हूँ। हे कृपानिधे! हे मेरे माता-पिता! अपनी वाणीसे कभी मैंने तुम्हें याद नहीं किया। तुम्हारा गुण-गान भी न सुना और न गाया। अपना हित छोड़ लोकलाजके पीछे मरा फिरा । हरिकीर्तन, संतोंका संग कभी मुझे अच्छा नहीं लगा। परनिन्दामें बड़ी रुचि थी, दूसरोंकी खूब निन्दा की। परोपकार न मैंने किया न दूसरोंसे कभी कराया। दूसरोंको पीड़ा पहुँचाने में कभी दया न आयी। ऐसा व्यवसाय किया जो न करना चाहिये और उससे पाया तो क्या, अपने कुटुम्बका भार ढोता फिरा तीथोकी कभी यात्रा नहीं की, केवल इस पिण्डके पालन करनेमें ही हाथ-पैर मारता रहा। मुझसे न संत सेवा बनी, न दान-पुण्य बना, न भगवान्‌की मूर्तिका दर्शन और पूजन-अर्चन ही बना कुसंगमें पड़कर अनेक अन्याय और अधर्म किये। मैंने अपना आप ही सत्यानाश किया, मैं अपना आप ही वैरी बना। भगवन्! तुम दयाके निधान हो, मुझे इस भवसागरके पार उतारो।


अपने गुणोंसे दूसरोंके दोष दूर करके उनकी ओर देखना चाहिये।


चार बातोंको याद रखो - बड़े-बूढ़ोंका आदर करना, छोटोंकी रक्षा और उनपर स्नेह करना, बुद्धिमानोंसे सलाह लेना और मूर्खोके साथ कभी नहीं उलझना।


संसारके सुख क्षणभंगुर हैं। तबतक किसीको सुखी नहीं समझना चाहिये जबतक कि वह सुखकी स्थितिमें मर न जाय।


साधु पुरुषो! सावधान रहना। फकीरो ! फकीरी पोशाकसे ही तुम्हें उसके दर्शन नहीं हो सकेंगे। इन बाहरी साधनोंमें ही साधुता मान बैठनेसे तो हानि ही होगी।


भगवान्‌की यादसे बढ़कर कोई पुण्य नहीं है और उनको भूल जानेसे बढ़कर कोई पाप नहीं है।


वे मनुष्य धन्य हैं, जो दयाशील हैं, क्योंकि परम पिताकी दयाके वे ही भागी हैं।


सूखी हड्डीमें खून नहीं होता, पर कुत्ता सूखी हड्डी चबाता है। उसे अपने खूनका स्वाद आता है, पर वह अज्ञानी उस आनन्दको हड्डीमें समझता है। यही दशा विषयी पुरुषोंकी है।


जो भगवान्के नामोंका संकीर्तन करता है, जो हरिभक्तोंको प्रिय है, जो महान् पुरुषोंकी सेवा करता है, ऐसा भक्त वन्दनीय है।


जो आनेवाले कालकी चिन्ता किये बिना प्रभुमें रत रहता है वही सच्चा सहनशील है।


सच्चा एकान्त कब हो? जब भगवान् से शून्य जीवनसे परे हो जाओ।


यदि अपना मन बदल जाय-साफ हो जाय तो अपने-आप ही व्यवहार-बर्तावमें परिवर्तन हो जायगा और उसका असर प्रतिपक्षीपर देर-सबेर पड़ेगा ही।


बहते पानीपर चाहे जितनी लकीरें खींचो एक भी लकीर न खिंचेगी, वैसे ही सत्त्वशुद्धिके बिना आत्मज्ञानकी एक भी किरण प्रकट न होगी।


कलियुगमें हरिनाम, हाँ केवल हरिनाम, एकमात्र हरिनाम ही संसार-सागरसे पार होनेका सर्वोत्तम साधन है। इसके सिवा इस कालमें दूसरी कोई गति नहीं है, नहीं है, दूसरी कोई गति है ही नहीं।


चित्त यदि भगवच्चिन्तनमें रँग जाय तो वह चित्त ही चैतन्य हो जाता है, पर चित्त शुद्ध भावसे रँग जाय तब।


साधुओंके संगसे श्रीभगवान्‌के पराक्रमका यथार्थ ज्ञान करानेवाली, हृदय और कानोंको सुख देनेवाली कथाएँ सुननेको मिलती हैं, उन कथाओंसे मोक्षरूप भगवान्‌में श्रद्धा होती है, श्रद्धासे रति और रतिसे भगवान्‌में भक्ति होती है।


यह जीवात्मा आप ही अपना तारक, आप ही अपना मारक है। आप ही अपना उद्धारक है। रे नित्यमुक्त आत्मा ! जरा सोच तो सही कि तू कहाँ अटका हुआ है।


शुभ कर्म करनेका स्वभाव ऐसा सुन्दर धन है कि जिसे न शत्रु छीन सकता और न चोर चुरा सकता है।


विषयीको संसार सुन्दर मालूम होता है, पर वहीं साधुको भयानक लगता है।


जिसने वासनाओंको पैरोंतले कुचल दिया है, वही मुक्त है।


जो ईश्वरके रंगमें रँगा हुआ है वही चतुर है और वही जगत्में सब तरहसे भला है।


बालकको जैसे रमणसुख नहीं समझाया जा सकता, वैसे ही मायामुग्ध, विषयासक्त, संसारी जीवको ब्रह्मानन्द नहीं समझाया जा सकता।


ईश्वरके चरण-कमल पकड़कर संसारका काम करो, बन्धनका डर नहीं रहेगा।


जो लोग प्रशंसा सुनकर तनिक भी हर्षके विकारसे ग्रस्त नहीं होते और निन्दा सुनते ही धीरताके साथ गहराई से आत्मनिरीक्षण करने लगते हैं, वे ही सच्चे बुद्धिमान् साधक हैं।


देहको चाहे जितना सुख-दुःख हो, भक्त उसका खयाल नहीं करते। उनकी वृत्ति तो प्रभुके चरणोंमें अनन्यभावसे लगी रहती है।


जो फलके लिये भगवान्‌की सेवा करते हैं और मनसे कामनाका त्याग नहीं करते, वे चीजका चौगुना दाम चाहनेवाले लोग सेवक नहीं है।