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देनेका संस्कार  [प्रेरक कहानी]
Hindi Story - Shikshaprad Kahani (Spiritual Story)

देनेका संस्कार

एक सन्तने एक द्वारपर आवाज लगायी- 'भिक्षां देहि ।' एक छोटी-सी बच्ची बाहर आयी और बोली 'बाबा! हम बहुत गरीब हैं और हमारे पास देनेको कुछ नहीं है।'
सन्त बोले- 'बेटी ! मना मत कर, अपने आँगनकी धूल ही दे दे।'
बच्चीने एक मुट्ठी धूल उठायी और भिक्षापात्रमें डाल दी। भिक्षा लेकर सन्त अपने शिष्यके साथ आगे बढ़ गये।
शिष्य बोला- 'गुरुजी, धूल भी कोई भिक्षा है। आपने धूल देनेको क्यों कहा?"
सन्त बोले- 'बेटा! अगर वह आज 'न' कह देती तो फिर कभी दान नहीं दे पाती। धूल दी तो क्या हुआ, दान देनेका संस्कार तो पड़ गया। आज धूल दी है तो भी उसमें दान देनेकी भावना तो

जागी।'



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deneka sanskaara

deneka sanskaara

ek santane ek dvaarapar aavaaj lagaayee- 'bhikshaan dehi .' ek chhotee-see bachchee baahar aayee aur bolee 'baabaa! ham bahut gareeb hain aur hamaare paas deneko kuchh naheen hai.'
sant bole- 'betee ! mana mat kar, apane aanganakee dhool hee de de.'
bachcheene ek mutthee dhool uthaayee aur bhikshaapaatramen daal dee. bhiksha lekar sant apane shishyake saath aage badha़ gaye.
shishy bolaa- 'gurujee, dhool bhee koee bhiksha hai. aapane dhool deneko kyon kahaa?"
sant bole- 'betaa! agar vah aaj 'na' kah detee to phir kabhee daan naheen de paatee. dhool dee to kya hua, daan deneka sanskaar to pada़ gayaa. aaj dhool dee hai to bhee usamen daan denekee bhaavana to

jaagee.'

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